लालबागचा राजा क्यों कहलाते हैं सारे देश में गणपति बाप्पा के सैकड़ों मंदिर हैं, लेकिन कुछ मंदिर अपनी विशेषताओं और अनोखी परंपराओं की वजह से एक अलग पहचान बना लेते हैं। ऐसा ही उनका एक अनोखा नाम है… लालबागचा राजा, यानी ‘लालबाग का राजा’।

लालबागचा राजा क्यों कहलाते हैं गणपति को
विघ्नकर्ता… मंगलकर्ता… विद्यादाता प्रभु गणेश। हर शुभ कार्य की शुरुआत में उनकी पूजा करना हमारी परंपरा का हिस्सा है। आज भारत में गणेश चतुर्थी बड़े उल्लास और आस्था के साथ मनाई जाती है। ज़्यादातर जगहों पर दस दिनों तक घर-घर और पंडालों में गणपति बाप्पा की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं। दस दिनों की पूजा-अर्चना के बाद अंत में विसर्जन के साथ प्रभु गणेश को विदाई दी जाती है। सारे देश में गणपति बाप्पा के सैकड़ों मंदिर हैं, लेकिन कुछ मंदिर अपनी विशेषताओं और अनोखी परंपराओं के कारण एक अलग पहचान बना लेते हैं। ऐसा ही उनका एक अनोखा नाम है… “लालबागचा राजा”, यानी ‘लालबाग का राजा’। यह मुंबई की सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक गणेश पूजा है। हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर लाखों भक्त उनके दर्शन के लिए आते हैं। उन्हें ‘नवसाचा गणपति’ या ‘मनोकामना पूरी करने वाले गणपति’ भी कहा जाता है।
इस गणेशोत्सव की शुरुआत वर्ष 1934 में हुई थी। उस समय मुंबई का लालबाग क्षेत्र मुख्य रूप से मछुआरों और व्यापारियों की बस्ती था। 1932 में वहाँ स्थित पेरू चॉल बाजार बंद हो जाने के कारण स्थानीय मछुआरे और व्यापारी अपनी आजीविका खो बैठे थे।
उन्होंने एक स्थायी बाज़ार के लिए भगवान गणेश से मनोकामना की थी। कुछ समय बाद उनकी मनोकामना पूरी हुई और उन्हें बाज़ार के लिए एक स्थायी स्थान मिल गया। इस मनोकामना पूरी होने की कृतज्ञता स्वरूप, स्थानीय लोगों ने 1934 में 12 सितंबर को पहली बार भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की। चूँकि यह प्रतिमा लालबाग क्षेत्र में स्थापित हुई थी और इसने सभी की मनोकामनाएँ पूरी की थीं, इसलिए लोगों ने उन्हें उस क्षेत्र का राजा मानना शुरू कर दिया। तभी से यहाँ के गणपति बाप्पा ‘लालबागचा राजा‘ नाम से प्रसिद्ध हो गए। तो फिर रहस्य चाहे जो भी क्यों न हो, इंसान की आस्था, विश्वास और भक्ति ही ईश्वर की प्रतिमा में जीवन भर देती है, प्राण प्रतिष्ठा करती है।
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