विवाहिता महिला के साथ संबंध हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यह स्पष्ट रूप से सहमति से बना संबंध था, जो बाद में खराब हो गया। यह संबंध तब तक चलता रहा जब तक महिला को यह पता नहीं चला कि आरोपी ने किसी और से विवाह कर लिया है। विवाह का झूठा वादा देकर यौन संबंध बनाने के एक मामले में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण निर्देश दिया है।

विवाहिता महिला के साथ संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा
हरियाणा हाईकोर्ट का राय है कि यदि कोई विवाहित महिला किसी पुरुष की झूठी विवाह प्रतिज्ञा सुनकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती है, तो इसे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने इसे अनैतिकता और विवाह संस्था की अवहेलना बताया है, लेकिन यह कानूनी अपराध नहीं है। बार एंड बेंच में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने एक मामले की सुनवाई करते हुए दिया है। इस मामले में एक विवाहित महिला ने एक व्यक्ति के खिलाफ विवाह का झूठा वादा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। निचली अदालत ने आरोपी को 9 साल की जेल की सज़ा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया है।
जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल ने इसे केवल व्यभिचार, अनैतिकता और विवाह संस्था की अवहेलना के कारण किया गया अपमान बताया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यह दुष्कर्म का मामला नहीं है। फैसले में कहा गया है कि पीड़िता कोई भोली-भाली या अज्ञानी युवती नहीं थी, बल्कि दो बच्चों की मां और आरोपी से 10 साल बड़ी थी। वह स्वयं बुद्धिमान और परिपक्व थी। उसे अपने निर्णय के परिणाम समझने का पूरा ज्ञान था। रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा, जब एक पूरी तरह परिपक्व विवाहित महिला विवाह के वादे पर यौन संबंध के लिए सहमति देती है और ऐसे कार्य में शामिल होती है, तो यह केवल अनैतिकता और विवाह संस्था की अवहेलना के कारण किया गया अपमान है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि वह झूठे वादे से बहलाई गई थी, स्वीकार्य नहीं है।
इस मामले में महिला ने दावा किया था कि वह अपने पति से तलाक लेने की प्रक्रिया में थी। लेकिन कोर्ट ने पाया कि यह दावा झूठा था। महिला ने यह भी स्वीकार किया कि वह अपने ससुराल में रह रही थी। उसने कभी भी अपने पति के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई या तलाक का मामला दायर नहीं किया था। महिला का एक और दावा था कि आरोपी ने उसके साथ 55-60 बार संबंध बनाए थे, लेकिन वह इसके लिए कोई तारीख या विशेष तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाई। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि यह स्पष्ट रूप से सहमति से बना संबंध था, जो बाद में खराब हो गया। यह संबंध तब तक चलता रहा जब तक महिला को यह पता नहीं चला कि आरोपी ने किसी और से विवाह कर लिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे संबंध को आपराधिक मामला बनाकर प्रतिशोध लेने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई वादा किया भी गया था तो वह कानून और समाज की नैतिकता के खिलाफ था। ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114-ए लागू नहीं होती। हाईकोर्ट ने आरोपी को निर्दोष घोषित कर दिया है।
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